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पुरुष… सिर्फ एक मजबूत कंधा या थका हुआ इंसान? | Men's Emotions & Society | KhabarForYou

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Name:-MADHU SHARMA
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पुरुष… सिर्फ एक मजबूत कंधा?

पुरुष…???

क्या है पुरुष?

वही हाड़-मांस से बना एक इंसान… या इस संसार का वह प्राणी जो न जाने कितनी जिम्मेदारियों से घिरा हुआ है, लेकिन जिसकी बात हम अक्सर कम ही करते हैं? हमारा समाज पुरुष प्रधान कहा जाता है। आज भी कई परिवारों में बेटे के जन्म की खुशी कुछ अलग ही होती है। आज भी कहीं न कहीं बेटे की चाह के पीछे यह सोच मौजूद है कि वही परिवार का नाम आगे बढ़ाएगा, वंश चलाएगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा और परिवार की जिम्मेदारियाँ संभालेगा।

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लेकिन कभी हमने खुद से पूछा है - आखिर लड़का ही क्यों? क्या सिर्फ इसलिए कि वह परिवार का नाम आगे बढ़ाए? क्या इसलिए कि वह माता-पिता का सहारा बने? या इसलिए कि बचपन से ही उसके कंधों पर जिम्मेदारियाँ रख दी जाएँ? हम अक्सर लड़कियों को घर संभालना, खाना बनाना और परिवार की देखभाल करना सिखाते हैं। वहीं लड़कों को पढ़ाई, नौकरी और कमाई के साथ-साथ परिवार की जिम्मेदारियाँ उठाना सिखाया जाता है।

बहन की रक्षा करनी है। - माता-पिता का सहारा बनना है। - परिवार के लिए मजबूत रहना है। - मुश्किल समय में आगे खड़ा होना है।

जिम्मेदारी का एहसास करवाना गलत नहीं है। लेकिन उसके साथ-साथ उसे यह एहसास दिलाना भी उतना ही जरूरी है -  “तुम एक इंसान भी हो।”

तुम्हें भी डर लग सकता है। - तुम्हें भी थकान हो सकती है। - तुम्हें भी किसी की जरूरत पड़ सकती है। - और सबसे जरूरी - तुम्हें भी अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का उतना ही अधिकार है।

लेकिन हमारा समाज पुरुषों से अक्सर एक ही चीज की उम्मीद करता है - मजबूत रहो।

जब कोई पुरुष अपनी परेशानी साझा करता है, अपनी भावनाओं के बारे में बात करता है या किसी के सहारे की जरूरत महसूस करता है, तो कभी-कभी उसे सुनने के बजाय यही कह दिया जाता है - “मर्द बनो।”


लेकिन भावनाएँ व्यक्त करना कमजोरी कब से हो गया?

हम महिलाओं के Emotional Validation की बात करते हैं। कहते हैं कि उन्हें सुना जाना चाहिए, समझा जाना चाहिए और उनकी भावनाओं को महत्व दिया जाना चाहिए।

बिल्कुल दिया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल यह है कि क्या भावनाओं की जरूरत सिर्फ महिलाओं को होती है?

जिस पुरुष को बचपन से सबका रक्षक बनना सिखाया गया, उसे यह क्यों नहीं बताया जाता कि तुम्हें भी अपने डर साझा करने का हक है?

हम कहते हैं - पिता बेटी का सहारा हैं। भाई बहन का सहारा है। पति पत्नी का सहारा है।

लेकिन कभी यह सवाल भी पूछा है - जिस पुरुष को सबका सहारा बनना सिखाया गया, उसके लिए कंधा कौन है?

एक रात की बात है। - एक पत्नी अपने पति के साथ बाइक पर बैठी थी। यह पहली बार नहीं था जब उसने अपने पति को देखा था। रोजमर्रा की जिंदगी में हम अपनों को देखते तो हैं, लेकिन शायद हमेशा देखते नहीं हैं। उस रात उसकी नजर उसके पति के कंधों पर गई।लगभग छह फुट का कद, चौड़े कंधे… वही कंधे जिन्हें उसने पहले भी न जाने कितनी बार देखा था। लेकिन उस रात उसे उन कंधों में कुछ अलग दिखाई दिया। उसे लगा - ये सिर्फ शरीर का हिस्सा नहीं हैं। इन कंधों पर कितनी जिम्मेदारियाँ टिकी हुई हैं। घर चलाने की चिंता, परिवार की जरूरतें, बच्चों का भविष्य, माता-पिता की जिम्मेदारी, नौकरी का दबाव, असफलताओं का डर और न जाने कितनी ऐसी बातें… जिन्हें शायद वह हर दिन अपने भीतर ही रखता है।

हम अक्सर पुरुष के मजबूत कंधे देखते हैं, उसकी मेहनत देखते हैं, उसका कमाना देखते हैं, उसका मुश्किल समय में खड़ा रहना देखते हैं। लेकिन उन सबके पीछे छिपी उसकी थकान कितनी बार देखते हैं? शायद पुरुषों को हमेशा समाधान नहीं चाहिए होता। कई बार उन्हें भी सिर्फ इतना चाहिए होता है कि कोई उनकी बात सुने - बिना उन्हें कमजोर समझे, बिना तुरंत सलाह दिए, बिना यह कहे कि “सब ठीक हो जाएगा।” क्योंकि सबका सहारा बनने वाले व्यक्ति को भी कभी-कभी सहारे की जरूरत होती है।

इसलिए अगली बार जब किसी पुरुष को देखें, तो सिर्फ उसके मजबूत व्यक्तित्व या चौड़े कंधों को मत देखिए। एक पल रुककर यह भी सोचिए - इन कंधों ने अब तक कितना कुछ उठाया होगा? हम शायद उसके कंधों का पूरा बोझ हल्का न कर सकें, लेकिन उसकी जिम्मेदारियाँ साझा करना तो सीख सकते हैं।

उसकी परेशानियों के बारे में पूछ सकते हैं।

उसकी चुप्पी को हमेशा “मजबूती” मानने के बजाय कभी-कभी उसे सुन सकते हैं।

उसे यह एहसास दिला सकते हैं कि हर परिस्थिति में अकेले खड़े रहना जरूरी नहीं है।

क्योंकि पुरुष सिर्फ कमाने वाला, रक्षक या परिवार का सहारा नहीं है।

वह भी एक इंसान है।

और शायद उसे सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि कोई उससे कहे - “तुम सबका सहारा हो, लेकिन तुम्हें भी सहारे की जरूरत हो सकती है। और उस जरूरत के लिए तुम्हें खुद को कमजोर साबित करने की जरूरत नहीं है।”

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